
Prakriti
In this poem I have tried to show different forms of Nature. One being the God like, necessary for our survival other one the destructive face which brings all calamities to us.
रुलाती भी तु, हसाँ ती भी तु ।
तडपाती भी तु, राहत दिलाती भी तु ।
दुनिया बनाती भी तु, उजाडती भी तु ।
देती भी तु, लेती भी तु
तुझे मैं प्रणाम करूं या करूं तेरा अपमान।
तुझसे मैं नफ़रत करूं या करूं तेरा सम्मान ।
तू ही बता प्रकृति, बता
कि मैं क्या करूं ।
अनाज से हमें लुभोदित करती भी तु ।
कभी तान्डव लिला दिखा के क्रोधित करती भी तु ।
आयुर्वेद देकर आयु बढाती भी तु ।
अनेक ज़हरों के रुप मे जान लेती भी तु ।
देवता भी तु, दानव भी तु ।
दुर्गा भी तु, काली भी तु ।
ब्रम्हा भी तु, भस्मासुर भी तु ।
रचती भी तु, बिगाड़ती भी तु ।
मेघ के रुप में खेतों में हरियाली लाती भी तु ।
बाढ़ के रुप मे कभी खेतों को डुबोती भी तु ।
जल्जलाती गर्मी में ठण्डी हवा देकर चैन लाती भी तु ।
कभी तूफ़ान के रुप में घरों को उडाती भी तु ।
सायर की कल्पना भी तु ।
मृत्यु का पर्याय भी तु ।
सप्नों का शहर भी तु ।
आतंक का कहर भी तु ।
तुझे मैं प्रणाम करूं या करूं तेरा अपमान।
तुझसे मैं नफ़रत करूं या करूं तेरा सम्मान ।
तू ही बता प्रकृति, बता
कि मैं क्या करूं ।
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